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सुप्रीम कोर्ट में सांसदों और विधायकों के आपराधिक मामलों की रिपोर्ट से बड़ा खुलासा हुआ है। 28 राज्यों के 14 सीएम और 170 लोकसभा सांसदों पर मामले लंबित हैं। जुलाई 2026 तक 4,192 ट्रायल अभी भी बाकी हैं।
यह कहानी उस दिन की है जब देश की सर्वोच्च अदालत में उन लोगों का रिकॉर्ड, खुला जिनके बारे में कहा जाता है कि वे हमारे देश के लिए कानून बनाते हैं। सांसदों और विधायकों के आपराधिक मामलों की फाइल जब सुप्रीम कोर्ट में खुली, तो एक-एक करके 28 राज्यों की परतें ,उधड़नी शुरू हुईं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला पन्ना मुख्यमंत्रियों वाला था । रिपोर्ट के पन्नों पर जो दर्ज था, उसमें लिखा था कि 14 मौजूदा मुख्यमंत्रियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित पड़े हैं। कहानी के इस हिस्से में सबसे बड़ा नाम तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी का उभरा, जिनके खाते में पूरे 89 मुकदमों का हिसाब दर्ज था।
रेवंत रेड्डी के बाद जब पन्ने और पलटे गए तो सुवेंदु अधिकारी का नाम सामने आया, और उसके साथ 29 मुकदमों का जिक्र भी था। फिर डीके शिवकुमार और चंद्रबाबू नायडू की कहानी 19-19 मुकदमों पर आकर रुकी। केरल के वी.डी. सतीशन के नाम 18 केस निकले , उसके बाद हेमंत सोरेन की बारी आई जिन पर 5 केस थे। देवेंद्र फडणवीस और सुखविंदर सिंह की फाइलों में 4-4 केस दर्ज मिले। कुछ और मुख्यमंत्री भी थे, जिन पर 1 से 2 मामलों की स्याही लगी थी, और बस इतना ही कहा गया।
असल में बात सिर्फ मुख्यमंत्रियों तक नहीं टिक पाई। विधानसभाओं के हाल ने कहानी को और भी ज्यादा उलझा दिया। पश्चिम बंगाल में 292 में से 170 विधायक दागी निकले। आंकड़ों के हिसाब से केरल के 57%, आंध्र प्रदेश के 56% और तेलंगाना के 49% विधायक मुकदमों में फंसे हैं। बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा भी पीछे नहीं रहे। फिर कहानी संसद में पहुंची, लोकसभा में 543 सांसदों में से 170 सांसद (31%) ऐसे मिले जिन पर गंभीर केस हैं, जिनमें केरल, बिहार और तेलंगाना के नेता भी शामिल बताए गए। 233 सदस्यों वाली राज्यसभा के 75 माननीयों पर भी केस मिले (40 तो बेहद गंभीर)।
इस लंबी कहानी का क्लाइमेक्स जुलाई 2026 के डेटा पर टिका। इसमें बताया गया कि देशभर में मौजूदा और पूर्व माननीयों के 4,192 मामले ट्रायल के स्तर पर अटके हैं। उत्तर प्रदेश इस पूरी दास्तान में 1,171 मुकदमों के साथ सबसे बड़ा किरदार बनकर उभरा। और अंत में, सुप्रीम कोर्ट से विशेष अदालतों के गठन और हाईकोर्ट की निगरानी की मांग की गई है। फिर भी, न्याय की कहानी यह भी कहती है कि आखिर फैसला अदालत का ही होता है; सिर्फ केस पेंडिंग होना किसी को मुजरिम नहीं बनाता… और यहीं जाकर बात रुक जाती है।
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