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बुधवार की सुबह नेपाल-चीन सीमा पर जब पहाड़ टूटा, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि ल्हेंदे खोला नदी मौत का सैलाब बन जाएगी। 178 लोगों की मौत और 300 लापता भारतीयों की दर्दनाक दास्तान।

यह दास्तान शुरू होती है नेपाल और तिब्बत के उन शांत बर्फीले पहाड़ों से, जहां बुधवार की सुबह अचानक सब कुछ मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। देखते ही देखते आई विनाशकारी बाढ़ ने 178 जिंदगियों को लील लिया, जिनमें नेपाल के 165 और तिब्बत के 3 लोग शामिल थे। इसके अलावा 1,400 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं, जिनकी तलाश में राहत दल दिन-रात मलबे की खाक छान रहे हैं।
घड़ी में सुबह के ठीक 8 बजकर 37 मिनट हुए थे, जब नेपाल-चीन सीमा के पास जमीन अचानक कांप उठी। काठमांडू तक लोगों को लगा कि 4.4 तीव्रता का भूकंप आया है। लेकिन हकीकत में, पहाड़ का एक विशालकाय हिस्सा बर्फ और पत्थरों के साथ भरभराकर ल्हेंदे खोला नदी में समा गया था। यह नदी चीन से निकलकर भोटेकोशी में मिलती है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि ग्लेशियर का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूटने से यह जलप्रलय आया, जिसे समझने में अभी हफ्तों लग जाएंगे।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने जब आंकड़ों का विश्लेषण किया, तो एक हैरान करने वाला सच सामने आया। वहां कोई भूकंप नहीं आया था, बल्कि पहाड़ से गिरे लैंडस्लाइड का वजन इतना भयानक था कि उसने धरती में 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर तीव्र कंपन पैदा कर दिया था।
इस तबाही के बीच तब मातम और गहरा गया जब नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनल ने गुरुवार को बताया कि बाढ़ में 300 से ज्यादा भारतीय नागरिक लापता हो गए हैं। नेपाल में 165 मौतों की पुष्टि हो चुकी थी और अपनों की तलाश में लोग बदहवास भटक रहे थे।
सीमा के उस पार तिब्बत में भी मातम पसरा था, जहां 558 लोग लापता बताए गए। बाढ़ की शुरुआत वहीं से हुई थी, और वह सैलाब अपने साथ भारी मलबा लेकर नेपाल की घाटियों में घुस आया, जिसने बस्तियों को खंडहर बना दिया।
तबाही के इस मंजर में नेपाली सेना ने बहादुरी की मिसाल पेश करते हुए रसुवा के टिमुरे से 116 लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। इनमें 21 भारतीय और 95 नेपाली नागरिक शामिल थे। इसके अलावा एक बंद टनल में फंसे 7 नेपाली मजदूरों को भी सुरक्षित बचा लिया गया।
नेपाल का यह पानी त्रिशूली नदी से होते हुए अब भारत की गंडक नदी की ओर बढ़ चला है, जहां 3 मीटर ऊंची लहरों का अलर्ट जारी हुआ है। बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली के साथ-साथ सीतामढ़ी व शिवहर के लोग सहमे हुए हैं। वहीं यूपी के महाराजगंज और कुशीनगर में भी अलर्ट घोषित कर दिया गया है।
पड़ोसी देश के इस दर्द को बांटते हुए भारत ने तुरंत 10 टन राहत सामग्री और जीवनरक्षक दवाइयां नेपाल भेजीं। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया पर इस कदम की जानकारी देते हुए कहा कि भारत इस मुश्किल वक्त में अपने नेपाली भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
संकट की इस घड़ी में चीन और नेपाल में मौजूद भारतीय दूतावासों ने तुरंत हेल्पलाइन नंबर जारी किए। फंसे नागरिकों के लिए स्थानीय चीनी अधिकारियों का नंबर 0086 139 8999 0012, बीजिंग दूतावास का नंबर 0086 185 1428 4905 और काठमांडू दूतावास के व्हाट्सएप नंबर +977 985 131 6807 व +977 970 910 7500 जारी किए गए ताकि हर भारतीय तक मदद पहुंच सके।
तबाही के बाद जब यह सवाल उठा कि क्या चीन ने अलर्ट देने में देरी की, तो नेपाल में चीनी दूतावास ने सामने आकर कहा कि ये बातें भ्रामक हैं। चीन ने किसी भी तरह की जानकारी छिपाने या लापरवाही के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
इस दर्दनाक घटना के बाद नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने प्रधानमंत्री बालेन शाह को फोन कर कहा कि रेस्क्यू में पूरी ताकत झोंक दी जाए। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने आश्वस्त किया कि हर एजेंसी ग्राउंड पर डटी है और हर जिंदगी को बचाने की आखिरी कोशिश की जा रही है।
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