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मध्य प्रदेश के स्कूलों में 1 से 3 सितंबर तक जन्माष्टमी की अद्भुत छटा देखने को मिलेगी। DPI के नए आदेश के बाद स्कूलों में कृष्ण लीला, गीता ज्ञान और गुरु-शिष्य परंपरा को मंच पर सजीव किया जाएगा।
मध्य प्रदेश के तमाम सरकारी और निजी स्कूलों में एक नई उमंग भर दी है। इस बार प्रदेश के हर विद्यालय में जन्माष्टमी का पावन पर्व बेहद अनोखे और सांस्कृतिक अंदाज में मनाने की तैयारी की गई है। जारी किए गए दिशा-निर्देशों के तहत आने वाली 1 से 3 सितंबर की तारीखों में स्कूलों का प्रांगण केवल किताबों से नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, गीता के अमर ज्ञान और भारतीय संस्कृति की गूंज से सराबोर रहेगा।
कहानी का पहला अध्याय 1 सितंबर से शुरू होकर 3 सितंबर तक अनवरत चलेगा, जिसके लिए DPI ने सभी जिलों के स्कूलों को तैयार रहने को कहा है। इन तीन दिनों के दौरान हर रोज विद्यालय परिसर में अलग-अलग तरह के रंगारंग और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस पूरे आयोजन का ताना-बाना इस तरह बुना गया है ताकि हर एक विद्यार्थी भगवान श्रीकृष्ण के बचपन, उनकी माखन चोरी और उनके महान आदर्शों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सके।
उत्सव के अगले पड़ाव में स्कूलों के मंच पर कृष्ण लीला का सुंदर मंचन देखने को मिलेगा। नन्हे-मुन्ने बच्चे जब कान्हा, यशोदा मैया, सुदामा और गोपियों के वेश में सज-धजकर मंच पर उतरेंगे, तो पूरा विद्यालय तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठेगा। इन बाल लीलाओं और संवादों के जरिए बच्चे न केवल अभिनय का हुनर सीखेंगे, बल्कि अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक परंपराओं को भी अपनी आंखों से देख सकेंगे।
जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ेगा, जन्माष्टमी के इस उत्सव में श्रीमद्भगवद्गीता का गहरा दर्शन भी अपनी रोशनी बिखेरेगा। स्कूलों में विद्यार्थी गीता के श्लोकों, कर्म की प्रधानता और श्रीकृष्ण के उपदेशों पर आधारित भावपूर्ण नाटक और नृत्य प्रस्तुत करेंगे। इन नाटकों के जरिए बच्चों के कोमल मनों में यह बात गहराई से उतारी जाएगी कि जीवन में कर्म और कर्तव्य ही सबसे बड़ी पूजा हैं।
इस यात्रा का एक बेहद भावुक और महत्वपूर्ण पड़ाव सांदीपनि विद्यालयों में देखने को मिलेगा। यहां भगवान श्रीकृष्ण और उनके गुरु महर्षि सांदीपनि के संबंधों की अमर गाथा को केंद्र में रखकर विशेष प्रस्तुतियां होंगी। इन आयोजनों के माध्यम से आज के आधुनिक युग में भी विद्यार्थियों को यह समझाया जाएगा कि गुरु का स्थान जीवन में कितना ऊंचा होता है और प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में संस्कार कितने जरूरी थे।
लोक शिक्षण संचालनालय ने पूरे प्रदेश के जिला शिक्षा अधिकारियों और स्कूल प्रबंधनों को चिट्ठी भेजकर इन कार्यक्रमों की पुख्ता तैयारी करने को कहा है। सभी प्राचार्यों से आग्रह किया गया है कि वे ज्यादा से ज्यादा छात्र-छात्राओं को इन गतिविधियों में शामिल करें, ताकि किताबी ज्ञान के साथ-साथ बच्चों के दिलों में अपनी संस्कृति, लोक परंपराओं और उच्च मानवीय संस्कारों के प्रति सच्चा प्रेम पनप सके।
इस तरह 1 से 3 सितंबर तक मध्य प्रदेश का हर स्कूल एक सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले लेगा। बाल-गोपाल के नटखट स्वरूप से लेकर महाभारत के मैदान में दिए गए उपदेशों तक, हर प्रसंग बच्चों की कला के जरिए जीवंत होगा। यह पूरी पहल इस बात की मिसाल बनेगी कि कैसे शिक्षा और संस्कृति एक साथ मिलकर बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल और संस्कारवान बना सकते हैं।
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