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22 अप्रैल के पहलगाम हमले (26 मौतें) के बाद 23 अप्रैल को भारत ने सिंधु जल संधि स्थगित की। इसके बाद जुलाई में PoJK में हिंसा और अगस्त में स्वात व बलूचिस्तान धमाकों के बीच, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने 14 अगस्त को भारत को पानी के मुद्दे पर चेतावनी दी है।
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का विवाद वाकई में कोई एक दिन में नहीं उभरा, बल्कि यह पिछले कुछ महीनों के घटते-घटते, फिर बढ़ते घटनाक्रमों की एक कड़ी कहानी है, बस लोगों को शायद पता चलता रहे.. इसकी ‘शुरुआत’ होती है 22 अप्रैल 2025 से, या यूं कहें, इसी तारीख ने सबको हिला दिया। इसी दिन जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादियों ने एक कायराना हरकत की, जिसमें 26 बेगुनाह लोग मारे गए। ये घटना इतनी भारी पड़ी कि भारत सरकार ने तुरंत, लेकिन सोच-समझकर, एक निर्णायक कदम उठा लिया। ठीक अगले दिन 23 अप्रैल को दिल्ली में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति बैठी और एक ऐतिहासिक फैसला कर दिया गया—सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित। भारत का साफ संकेत था कि 1960 की उस दौर वाली परिस्थितियों में बना यह समझौता, अब आगे नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि सीमा पार आतंकवाद रुक न जाए।
फिर जुलाई वाला दौर आया, और बात धीरे-धीरे PoJK तक पहुंचने लगी। जैसे-जैसे साल आगे चला, पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बिगड़ते गए। जुलाई के आख़िर तक पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में बगावत वाली आंच तेज हो चुकी थी, वहां की सड़कें और माहौल दोनों गरम होने लगे। Joint Awami Action Committee (JAAC) ने न केवल सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि राजनीतिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सरकार पर मोर्चा भी खोल दिया। नतीजा ये हुआ कि प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें होती रहीं। हालत इतनी नाजुक हो गई कि वहां इंटरनेट और यातायात दोनों को पूरी तरह रोकना पड़ा, मानो सब कुछ ठहरा दिया गया हो।
अगस्त की शुरुआत आते-आते पाकिस्तान का हाल और भी सख्त हो गया। 2 अगस्त को खैबर पख्तूनख्वा के स्वात में लोग आतंकवाद के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। तभी काबल पुलिस स्टेशन के पास एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा दिया। इस हादसे में 17 लोगों की मौत हो गई और 34 लोग घायल बताए गए। ये घटना, इस बात की ओर इशारा करती हुई दिखी कि पाकिस्तान खुद, अपने ही इलाके में, आतंकवाद की आग में झुलस रहा है—यानी समस्या सामने है, और नियंत्रण कहीं नहीं।
12 अगस्त को बलूचिस्तान में फिर वही खून-खराबा वाला मंजर दिखा। स्वतंत्रता दिवस से ठीक दो दिन पहले, 12 अगस्त को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने एक अभियान चलाकर 10 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया। लेकिन उसी दिन सुराब इलाके में एक समय-पूर्व कार बम धमाके में 3 नागरिक और 8 हथियारबंद लोगों की भी जान चली गई। इसके बाद बलूच राष्ट्रवादी समूहों ने एलान कर दिया कि वे 14 अगस्त को ‘ब्लैक डे’ मनाएंगे, और काले झंडे तथा काली पट्टी के साथ सरकारी समारोहों का बहिष्कार करेंगे।
और फिर 14 अगस्त आया, माहौल में पहले से जो तनाव था वही और गाढ़ा हो गया। इस पूरे पृष्ठभूमि में जेल में बंद पूर्व पीएम इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का राजनीतिक संकट भी चल रहा था। साथ ही अगस्त में PoJK के अंतिम चरण के चुनाव (जिन्हें सुरक्षा कारणों से टालना पड़ा) को लेकर भी अनिश्चितता फैली हुई थी। इसी बीच 14 अगस्त को, स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम से पहले प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस्लामाबाद में मंच पर आए। उन्होंने अपने देश की तमाम भीषण चुनौतियों को मानो साइड में रखकर, भारत को चेतावनी दे डाली। शहबाज शरीफ ने सिंधु जल संधि को ‘रेड लाइन’ कहते हुए कहा कि पानी की एक बूंद पर भी कोई समझौता नहीं होगा , और भारत को शांति का दुश्मन भी कहा। कुल मिलाकर ये कहानी यही समझाती है कि कैसे एक अस्थिर राष्ट्र अपनी कमजोरियों को ढकने की कोशिश में, पड़ोसी देश पर ही निशाना साधने लगता है।
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