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बोफोर्स विवाद ने भारतीय राजनीति और कारगिल युद्ध दोनों को प्रभावित किया। जानें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद पूरे मामले की अहम बातें।
नई दिल्ली। लगभग चार दशक से लेकर भारतीय राजनीति और न्यायपालिका में हलचल का कारण बने बोफोर्स घोटाले को आखिरकार अब… कानूनी तौर पर थम गया है, या यूं कहें पूरी तरह बंद हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी आखिरी बची हुई याचिका भी खारिज कर दी। इसके बाद 1986 के रक्षा सौदे से संबंधित ये बहुचर्चित किस्सा भी पूरी तरह खत्म, यानी कानूनी रूप से विराम ले चुका है। हालांकि अदालत में जो आरोप थे, वो साबित नहीं हो सके , फिर भी बोफोर्स विवाद ने राजनीति के साथ रक्षा इतिहास पर एक खास, गहरा असर छोड़ा रहा.
बोफोर्स घोटाले के आरोप सामने आते ही तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया, और फिर मामला तुरंत राष्ट्रीय राजनीति की तख्ती पर आ गया। 1989 के लोकसभा चुनाव में भी बोफोर्स का प्रभाव साफ दिखा , कांग्रेस को शिकस्त झेलनी पड़ी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित, और सबसे ज्यादा बहस वाले राजनीतिक टकरावों में गिना जाता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले में आगे सुनवाई का कोई खास औचित्य नहीं बचता. अदालत ने 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को दी गई राहत के खिलाफ दायर अपील भी ठुकरा दी। इसके बाद बोफोर्स घोटाले से जुड़ी सारी लंबित कानूनी गतिविधियां समाप्त हो गईं, और करीब 40 साल पुराना ये मामला न्यायिक तौर पर भी विराम पा गया.
भले ही बोफोर्स सौदा लंबे समय तक विवादों में चलता रहा , पर भारतीय सेना में शामिल होने के बाद यही तोप कारगिल युद्ध के दौरान काफी प्रभावी साबित हुई। ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में, लंबी दूरी तक ठीक ठीक सटीक गोलाबारी करने की इसकी क्षमता ने भारतीय सेना को सामरिक बढ़त दी, जैसे कि एक महत्वपूर्ण बढ़त वाली बात हो गई. आज भी बोफोर्स तोप भारतीय सेना की भरोसेमंद तोपों में गिनी जाती है.
बोफोर्स घोटाला वो मामला रहा जिसने राजनीति, न्यायपालिका, जांच एजेंसियों और रक्षा व्यवस्था तक को कई दशकों तक प्रभावित किया. अब जब कानूनी प्रक्रिया खत्म हो चुकी है फिर भी ये विवाद भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में कहीं न कहीं हमेशा दर्ज रहेगा.
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